कैब एग्रीगेटर्स का खेल : कभी 120 तो कभी 300 पार, जानिए उबर और रैपिडो के बढ़ते किराए का पूरा गणित

0
10

अक्सर देखा जाता है कि जिस 5 किलोमीटर के सफर के लिए आप सामान्य दिनों में ₹120 देते हैं, वही दूरी दफ्तर के पीक ऑवर्स या बारिश के समय ₹300 से ऊपर पहुंच जाती है। उबर (Uber) और रैपिडो (Rapido) जैसी कंपनियों के यूज़र्स आए दिन इस अचानक बढ़ते किराए की शिकायत करते हैं। तो क्या ये कंपनियां अपनी मर्जी से मनचाहा किराया वसूलती हैं या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक सिस्टम काम करता है? आइए इस पूरे खेल को आसान शब्दों में समझते हैं।

अगर आपके मन में भी यह सवाल उठता है कि कल तक जो राइड बेहद सस्ती थी, आज वह दोगुनी महंगी क्यों है, तो इसका सीधा जवाब है— सर्ज प्राइसिंग (Surge Pricing)

क्या है सर्ज प्राइसिंग और यह कैसे काम करती है?

उबर और रैपिडो जैसी मोबाइल ऐप्स पर मिलने वाली राइड्स का किराया कभी भी फिक्स नहीं रहता। यह पूरी तरह से डिमांड (मांग) और सप्लाई (उपलब्धता) के सिद्धांत पर काम करता है।

  • असंतुलन का असर: जब किसी खास इलाके में एक ही समय पर कैब बुक करने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा हो जाती है, और उसके मुकाबले वहां ड्राइवर्स कम होते हैं, तो ऐप का सिस्टम (एल्गोरिदम) ऑटोमैटिक तरीके से किराया बढ़ा देता है।
  • लॉजिक: उबर के मुताबिक, सर्ज प्राइसिंग का मुख्य उद्देश्य दूसरे इलाकों के ड्राइवरों को उस हाई-डिमांड वाले इलाके की तरफ आकर्षित करना होता है, ताकि यात्रियों को जल्दी गाड़ी मिल सके।

किराया सबसे ज्यादा कब और कहाँ बढ़ता है?

यदि आप नियमित रूप से कैब या बाइक टैक्सी का इस्तेमाल करते हैं, तो आपने गौर किया होगा कि कुछ खास मौकों पर जेब पर ज्यादा बोझ पड़ता है:

  • समय और मौसम: सुबह दफ्तर जाने और शाम को घर लौटने का पीक टाइम, भारी बारिश या तगड़ा ट्रैफिक जाम।
  • लोकेशन: एयरपोर्ट, बड़े रेलवे स्टेशन, बस टर्मिनल, त्योहारों के दौरान बाजार या किसी बड़े इवेंट/मॉल के आसपास।इन जगहों पर अचानक सैकड़ों लोग एक साथ ऐप ओपन करते हैं, जिससे सिस्टम तुरंत रेट बढ़ा देता है। रैपिडो (Rapido) भी इसी ‘डायनामिक प्राइसिंग’ के तहत काम करता है, हालांकि बाइक टैक्सी होने के कारण इसका बेस फेयर उबर से थोड़ा कम हो सकता है।

क्या आपकी राइडिंग हिस्ट्री और फोन की बैटरी से तय होता है किराया?

인टरनेट और सोशल मीडिया पर किराए को लेकर कई तरह की थ्योरीज और दावे चलते रहते हैं, जिनकी हकीकत कुछ यूं है:

सोशल मीडिया के दावेवास्तविकता और कंपनियों का पक्ष
पुरानी हिस्ट्री देखकर रेट तय होनाफोर्ब्स की एक रिपोर्ट में संकेत दिया गया था कि आधुनिक एल्गोरिदम इस बात का अनुमान लगाते हैं कि कोई ग्राहक कितना भुगतान कर सकता है। हालांकि, उबर का कहना है कि उनका सिस्टम केवल डिमांड और सप्लाई पर केंद्रित है।
फोन की बैटरी कम होने पर महंगा किरायायह दावा काफी वायरल रहा है कि कम बैटरी होने पर यूजर मजबूरी में महंगा किराया देगा, इसलिए ऐप रेट बढ़ा देती है। लेकिन उबर ने इसे पूरी तरह अफवाह बताते हुए साफ किया है कि वे बैटरी प्रतिशत के आधार पर किराया तय नहीं करते।

महंगे किराए (सर्ज प्राइसिंग) से बचने के आसान उपाय

यदि आप हर बार बढ़ा हुआ किराया देने से बचना चाहते हैं, तो इन स्मार्ट टिप्स को अपना सकते हैं:

  1. 5-10 मिनट का इंतजार: अगर आपको बहुत ज्यादा जल्दी नहीं है, तो बुकिंग करने के लिए थोड़ा रुक जाएं। जैसे ही उस इलाके में डिमांड कम होगी या ड्राइवर्स बढ़ेंगे, किराया अपने आप सामान्य हो जाएगा।
  2. किराए की तुलना करें: बुकिंग करने से पहले हमेशा उबर और रैपिडो दोनों ऐप्स पर रेट चेक कर लें। कई बार दोनों के किराए में ₹100 तक का अंतर मिल जाता है।
  3. लोकेशन थोड़ा बदलें: यदि आप एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन के मुख्य निकास द्वार पर खड़े हैं, तो थोड़ा पैदल चलकर हाई-डिमांड जोन से बाहर आ जाएं। केवल 100-200 मीटर दूर हटकर बुक करने से भी किराया कम हो जाता है।
  4. पूल या शेयर्ड राइड: जहां उपलब्ध हो, वहां शेयर्ड राइड का विकल्प चुनें, यह सिंगल राइड के मुकाबले काफी सस्ता पड़ता है।

निष्कर्ष :

उबर और रैपिडो का किराया किसी एक तय पैमाने पर नहीं चलता, यह पल-पल बदलता है। ऐसे में बुकिंग करने से पहले स्क्रीन पर दिख रहे ‘अपफ्रंट फेयर’ (पहले दिखने वाले किराए) को ध्यान से देखें। थोड़ी सी समझदारी और प्लानिंग से आप हर महीने ट्रैवलिंग पर होने वाले एक बड़े खर्च को बचा सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here