ईरान संकट: पेट्रोल-डीजल के बाद अब भारत में बुनियादी ढांचा और सड़क निर्माण परियोजनाओं पर खतरा

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वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल और मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ते तनाव का असर अब भारत के केवल ईंधन आयात तक सीमित नहीं रहा है। इसका सीधा और गंभीर प्रभाव देश के बुनियादी ढांचे, विशेषकर सड़क निर्माण और उनकी मरम्मत के कार्यों पर दिखने लगा है।

ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी गतिरोध के कारण सड़क बनाने का मुख्य घटक—बिटुमेन (Bitumen)—न केवल अत्यधिक महंगा हो गया है, बल्कि इसकी आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) भी बुरी तरह बाधित हुई है।

बिटुमेन: सड़कों का आधार और ‘कच्चे तेल’ का खेल

आमतौर पर लोग सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले काले गाढ़े पदार्थ को ‘तारकोल या कोलटार’ समझते हैं, जो कि कोयले से बनता है। लेकिन आधुनिक सड़कें बिटुमेन से बनती हैं, जो कच्चे तेल (Crude Oil) के शुद्धिकरण (Refining) की प्रक्रिया का सह-उत्पाद (By-product) है।

  • निर्माण में भूमिका: जब पेट्रोलियम रिफाइनरियों में कच्चे तेल से पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और एलपीजी अलग कर लिए जाते हैं, तो अंत में बचने वाला सबसे भारी और चिपचिपा पदार्थ बिटुमेन कहलाता है। यह कंक्रीट, गिट्टी और मिट्टी को आपस में मजबूती से जोड़ने का काम करता है। इसके बिना टिकाऊ सड़कें बनाना या गड्ढों की मरम्मत करना असंभव है।

भारत में बिटुमेन संकट: मांग और आपूर्ति का असंतुलन

भारत अपनी अवसंरचना (Infrastructure) को मजबूत करने के लिए भारी मात्रा में बिटुमेन का उपयोग करता है, लेकिन घरेलू उत्पादन मांग के मुकाबले काफी कम है:

  • सालाना मांग: भारत को हर साल लगभग 90 लाख टन बिटुमेन की आवश्यकता होती है।
  • घरेलू उत्पादन: देश की रिफाइनरियां केवल 54 लाख टन का ही उत्पादन कर पाती हैं।
  • आयात पर निर्भरता: शेष 30% से 40% (लगभग 36 लाख टन) बिटुमेन इराक, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ईरान और ओमान जैसे खाड़ी देशों से आयात किया जाता है।

होर्मुज जलमार्ग बंद होने और युद्ध के कारण इस 36 लाख टन की विदेशी आपूर्ति पर ब्रेक लग गया है।

दोहरी मार: आसमान छूती कीमतें और थमता काम

  1. कीमतों में रिकॉर्ड उछाल: आपूर्ति ठप होने और कच्चे तेल के दाम बढ़ने से बिटुमेन की कीमतें 40,000 रुपये प्रति टन से बढ़कर सीधे 80,000 रुपये प्रति टन (दोगुनी) हो चुकी हैं।
  2. परियोजनाओं का रुकना: सड़क निर्माण के अधिकांश ठेके (Contracts) पुरानी और कम दरों पर दिए गए थे। लागत दोगुनी होने के कारण ठेकेदारों के लिए काम जारी रखना वित्तीय रूप से नुकसानदेह हो गया है।
  3. ग्रामीण और शहरी सड़कों पर असर: ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ के तहत बनने वाली ग्रामीण सड़कें और राज्यों के लोक निर्माण विभाग (PWD) के प्रोजेक्ट सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) भी राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए बिटुमेन की व्यवस्था करने में कड़ी मशक्कत कर रहा है।

क्या ‘बायो-बिटुमेन’ है भारत का भविष्य?

इस संकट से निपटने के लिए भारत ने बायो-बिटुमेन (Bio-Bitumen) के रूप में एक वैकल्पिक तकनीक पर काम शुरू किया है, जिसमें धान के भूसे (Straw) का उपयोग करके यह पदार्थ तैयार किया जा रहा है।

हालांकि, इस साल की शुरुआत में इसका उत्पादन तो शुरू हो गया है, लेकिन वर्तमान में इसकी उत्पादन क्षमता बेहद सीमित है। देश की 90 लाख टन की विशाल मांग को पूरा करने के लिए अभी यह मात्रा न के बराबर है।

रणनीतिक दृष्टिकोण: मानसून के बाद सड़कों की बड़े पैमाने पर मरम्मत और नए प्रोजेक्ट्स शुरू होने होते हैं। ऐसे में यदि खाड़ी देशों में तनाव कम नहीं हुआ और बिटुमेन की किल्लत बनी रही, तो देश की परिवहन व्यवस्था और सड़कों की गुणवत्ता पर इसका बेहद गंभीर और दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।

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