तुर्की का S-400 सौदा: अमेरिकी F-35 की चाहत और पुतिन का वीटो, समझें पूरा भू-राजनीतिक खेल

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मुख्य बिंदु:

  • तुर्की अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने और F-35 कार्यक्रम में वापसी के लिए S-400 रक्षा प्रणाली को किसी तीसरे देश को बेचने पर विचार कर रहा है।
  • रूस के साथ हुए समझौते के नियमों के कारण तुर्की बिना मॉस्को की अनुमति के यह कदम नहीं उठा सकता।
  • खाड़ी देशों (UAE और कतर) को यह सिस्टम बेचने से अमेरिका की सुरक्षा चिंताएं और बढ़ सकती हैं।

भूमिका

साल 2017 में तुर्की द्वारा रूस से खरीदी गई S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम अब अंकारा के लिए रणनीतिक रूप से एक बड़ा सिरदर्द बन चुकी है। ताजा मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन इस रूसी मिसाइल प्रणाली से छुटकारा पाने की योजना बना रहे हैं, ताकि वाशिंगटन के साथ बिगड़े रिश्तों को सुधारा जा सके। तुर्की का मुख्य उद्देश्य अमेरिका के अत्याधुनिक F-35 स्टील्थ फाइटर जेट प्रोग्राम में अपनी जगह दोबारा पक्की करना है, जिससे उसे बाहर कर दिया गया था।

तुर्की क्यों छोड़ना चाहता है S-400 का साथ?

रूसी रक्षा प्रणाली खरीदने के बाद अमेरिका ने तुर्की पर CAATSA (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act) के तहत सख्त प्रतिबंध लगा दिए थे। अमेरिकी प्रशासन का मानना था कि नाटो (NATO) सदस्य देश में रूसी रडार प्रणाली की मौजूदगी F-35 जैसे संवेदनशील विमानों की गुप्त तकनीक (Stealth Technology) को खतरे में डाल सकती है।

अब, अमेरिका में सत्ता परिवर्तन और डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के संकेतों के बाद, तुर्की को उम्मीद है कि यदि वह S-400 को अपने देश से हटा देता है, तो उस पर से प्रतिबंध हट सकते हैं। यह तुर्की के अरबों डॉलर के रक्षा उद्योग और सैन्य आधुनिकीकरण के लिए बेहद जरूरी है।

कानूनी पेंच: क्या तुर्की स्वतंत्र रूप से ले सकता है फैसला?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ी रुकावट रूस और तुर्की के बीच हुआ द्विपक्षीय समझौता है। अनुबंध की शर्तों के अनुसार, तुर्की इस मिसाइल प्रणाली को रूस की औपचारिक लिखित सहमति के बिना किसी भी तीसरे देश को हस्तांतरित या बेच नहीं सकता है। हाल ही में क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति कार्यालय) के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने भी स्वीकार किया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है, जिससे साफ है कि अंतिम निर्णय की चाबी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के पास ही है।

संभावित खरीदार और अमेरिका की नई दुविधा

रिपोर्ट्स के अनुसार, तुर्की इस सिस्टम को खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों, विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) या कतर को सौंपने पर विचार कर रहा है। ईरान के साथ बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच खाड़ी देश अपनी हवाई सुरक्षा को मजबूत करना चाहते हैं।

रणनीतिक विरोधाभास: यदि तुर्की इस प्रणाली को हटाता है तो अमेरिका की एक चिंता दूर होगी, लेकिन अगर यही S-400 कतर या UAE पहुंच जाता है, तो यह कतर स्थित अमेरिका के प्रमुख ‘अल-उदैद एयर बेस’ के बेहद करीब आ जाएगा। इससे अमेरिकी विमानों की सुरक्षा को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो सकता है।

रूस की रणनीति और भारत का रुख

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस इस सौदे पर आसानी से राजी नहीं होगा। यूक्रेन युद्ध के चलते रूस को खुद उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों की आवश्यकता है, और वह तुर्की पर अपना भू-राजनीतिक दबाव बनाए रखना चाहेगा।

जहाँ तक भारत का सवाल है, हालांकि भारतीय वायुसेना पहले से ही S-400 का संचालन कर रही है और वह एक संभावित खरीदार हो सकता था, लेकिन वर्तमान में भारत और तुर्की के राजनयिक संबंधों में शीतलता (विशेष रूप से तुर्की के पाकिस्तान समर्थक रुख के कारण) को देखते हुए, भारत द्वारा इसे खरीदने की संभावना न के बराबर है।

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