मुख्य बातें ( Highlights ) :
- भारत ने वर्ष 2028-29 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सदस्यता हेतु अपना आधिकारिक अभियान शुरू किया है।
- आज से ठीक 50 साल पहले, साल 1975 में भारत और पाकिस्तान के बीच UNSC की एक अस्थायी सीट को लेकर ऐतिहासिक कूटनीतिक मुकाबला हुआ था।
- 8 दौर की कड़ी वोटिंग और वैश्विक दबाव के बाद भारत को रणनीतिक रूप से अपना नाम वापस लेना पड़ा था।
- आज समय का पहिया घूम चुका है और मजबूत अर्थव्यवस्था व कूटनीति के दम पर भारत ‘ग्लोबल साउथ’ की सबसे बुलंद आवाज बनकर उभरा है।
भूमिका: कूटनीति का बदलता चक्र
आज भारत वैश्विक मंच पर एक महाशक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी बेहद मजबूती से पेश कर रहा है। वर्तमान में जारी यूक्रेन संकट और पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के तनाव के बीच, भारत ने साल 2028-29 के कार्यकाल के लिए UNSC के अस्थायी सदस्य पद हेतु अपना अभियान शुरू कर दिया है।
लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा दौर भी दर्ज है, जब भारत को कूटनीतिक मोर्चे पर पड़ोसी देश पाकिस्तान से मात खानी पड़ी थी। दिसंबर 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को धूल चटाने और बांग्लादेश को स्वतंत्र कराने के बाद भारत का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था, लेकिन इसके ठीक 4 साल बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) के गलियारों में कुछ ऐसा हुआ जिसने भारत को एक बड़ा कूटनीतिक सबक दिया।
साल 1975 का वह ऐतिहासिक मुकाबला
साल 1975 में जब संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने वर्ष 1976-77 के कार्यकाल के लिए गैर-स्थायी (अस्थायी) सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया शुरू की, तब एशिया-पैसिफिक समूह की एक सीट के लिए भारत और पाकिस्तान आमने-सामने आ गए।
कैसी थी उस समय की जियोपॉलिटिक्स?
- पाकिस्तान की स्थिति: 1971 की करारी हार के बाद पाकिस्तान वैश्विक मंच पर खुद को दोबारा स्थापित करने की कोशिश में जुटा था। वह गुपचुप तरीके से परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा था।
- भारत की स्थिति: तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ (NAM) का नेतृत्व कर रहा था और विकासशील देशों की आवाज बना हुआ था। हालांकि, आंतरिक रूप से देश आर्थिक संकट और आपातकाल (Emergency) के दौर से गुजर रहा था।
8 राउंड का सियासी ड्रामा और भारत का पीछे हटना
UNSC की अस्थायी सदस्यता पाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में दो-तिहाई बहुमत (तत्कालीन सदस्य संख्या के आधार पर करीब 93-94 वोट) पाना अनिवार्य था।
- वोटिंग का गणित: 20 से 23 अक्टूबर 1975 के बीच कुल 8 दौर की वोटिंग हुई। पहले दौर में भारत को 60 और पाकिस्तान को 59 वोट मिले। इसके बाद के राउंड्स में भी मुकाबला बेहद करीबी रहा, लेकिन कोई भी देश आवश्यक बहुमत के आंकड़े को नहीं छू सका।
- वैश्विक दबाव: लगातार खींचतान को देखते हुए कई मित्र देशों (मिस्र, कुवैत, ईरान, अल्जीरिया, थाईलैंड और अर्जेंटीना) ने दोनों देशों से सहमति बनाने की अपील की।
- रणनीतिक समझौता: अंततः, लंबे संघर्ष और समय की बर्बादी से बचने के लिए संयुक्त राष्ट्र में भारत के तत्कालीन स्थायी प्रतिनिधि जयपाल ने अपना नामांकन वापस ले लिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य के चुनावों में अन्य देश भारत का समर्थन करेंगे। इसके बाद पाकिस्तान 123 मतों के साथ निर्विरोध चुन लिया गया।
क्यों हुई थी भारत की कूटनीतिक हार?
विशेषज्ञों के अनुसार, उस समय भारत के पीछे हटने के मुख्य रूप से तीन कारण थे:
- इस्लामिक ब्लॉक की एकजुटता: 1970 के दशक में ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (OIC) का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। मुस्लिम और अरब देशों ने एकजुट होकर पाकिस्तान का पक्ष लिया।
- महाशक्तियों का समीकरण: पाकिस्तान को अमेरिका और चीन जैसी वैश्विक महाशक्तियों का सीधा समर्थन हासिल था, जबकि भारत मुख्य रूप से सोवियत संघ (रूस) पर निर्भर था।
- घरेलू मोर्चे पर चुनौतियां: 1975 में भारत के भीतर राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक मोर्चे पर कई दिक्कतें थीं, जिसके कारण सरकार वैश्विक कूटनीतिक रस्साकशी में अधिक समय और ऊर्जा बर्बाद नहीं करना चाहती थी।
50 साल बाद: आज पूरी तरह बदल चुकी हैं परिस्थितियां
कल की वो कूटनीतिक चूक आज भारत के लिए एक बड़ी सीख बन चुकी है। पिछले 50 वर्षों में वैश्विक मंच पर भारत और पाकिस्तान की हैसियत में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है:
- आर्थिक महाशक्ति: भारत आज दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट और कर्ज के जाल में फंसा हुआ है।
- वैश्विक शांति में योगदान: संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों (Peacekeeping) में भारत सबसे बड़ा योगदान देने वाले देशों में शामिल है।
- नया नैरेटिव: भारत अब केवल सीट जीतने के लिए नहीं लड़ रहा, बल्कि SHANTI (Securing Holistic Advancement through Norms, Trust, and Integrity) जैसी पहलों के माध्यम से पूरे यूएनएससी (UNSC) के ढांचे में सुधार की वकालत कर रहा है।
निष्कर्ष
1975 का वह घटनाक्रम भारत की हार नहीं बल्कि एक रणनीतिक विराम था। आज कूटनीति के मोर्चे पर भारत ने अपनी खोई हुई जमीन से आगे बढ़कर नया मुकाम हासिल कर लिया है। आगामी 2028-29 की यूएनएससी अस्थायी सदस्यता के लिए भारत का अभियान यह साबित करता है कि अब भारत रक्षात्मक कूटनीति से बाहर निकलकर वैश्विक नीति-निर्धारक की भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
